जाने में अनजाने में
कुछ नगमें गीत सुनाने में
आँखों को धोखा दे-देकर
यूँ हँसने और हँसाने में
खुद ही जो अर्जित किये कष्ट
उन 'कष्टों' का अपमान हुआ !
गति न मिली तन को मन की
न जग से विरति हुई मन की
संसार सिमटता रहा मगर
न मिटी ये दूरी तन-मन की
इस क्रम में जो न हुये सिद्ध
उन '' का अपमान हुआ !
तपसी न हुये थे बड़े लक्ष्य
युद्धों में छलनी हुआ वक्ष
मन 'धर्मराज' होना चाहे
जबसे जीवन हो गया यक्ष
इस क्रम में जो न पूर्ण हुये
उन 'सपनों' का अपमान हुआ !
कुछ होने-पाने के क्रम में
जो बाकी है इस जीवन में
वो सब कुछ हँसता है हम पर
पथ के प्रत्येक परिवर्तन में
ऐसा पथिक मिला जिसको
उस '' का ही अपमान हुआ !
जीवन से पूर्ण पलायन हो
या जीवन में परिवर्तन हो
या तो सत् चित् आनन्द मिलें
या पीड़ा में भी नर्तन हो !
इससे भी अगर कुछ कम मांगा
तो 'स्वामी' का अपमान हुआ !
-ओम अवस्थी
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