आविर्भूत हुई मैं
यज्ञकुण्ड की अग्नि के गर्भ से।
अंगारों पर गुज़रा जीवन,
अग्निपरीक्षा देते-देते,
प्रतिशोध से भरा मेरा दामन।
द्रुपद-नन्दिनी, राज-दुलारी,
धृष्टद्युम्न की मैं अनुजा थी।
पाँचों पाण्डवों में बँटी हुई,
मैं नित्ययोगिनी कृष्णा थी।
शलाका मैं कौन्तेय की,
और गदा थी भीम की।
गाण्डीव मैं अर्जुन की,
शमशीर नकुल-सहदेव की।
गुरु द्रोण के अपमान का
प्रतिकार बनकर आई मैं।
काली के अवतार में,
कृष्ण की सखा कहलाई मैं।
मैं पार्षती, सौत्रामणी-सुता,
इन्द्रप्रस्थ की पटरानी थी।
अभिमानी राजाओं का
मान हरने आई थी।
कौरवों और पाण्डवों के
बीच की मैं द्वंद्व थी।
महाभारत के महायुद्ध की
मैं भी एक अंग थी।
बचपन बीता, आई जवानी,
गठबंधन की शुभ मुहूर्त भी छाई।
किया तात ने स्वयंवर का आयोजन,
भेजा जिसमें वीरों को आमंत्रण।
मत्स्य-नेत्र भेदन का
रखा गया था प्रयोजन।
जो उसे भेद सके,
होगा उसी का यहाँ अभिनन्दन।
बड़े-बड़े योद्धाओं ने
अपना पराक्रम दिखलाया।
क्षत्रियों के उस समागम ने
उनके दंभ को दर्प दिखाया।
पर नियति की नीति ने
द्रौपदी से छल करवाया।
सूतपुत्र कहकर कर्ण को
वीरों की सभा से हटवाया।
मित्र-अपमान देखकर
दुर्योधन क्रोध से भर बैठा।
द्रौपदी के इस तिरस्कार का
प्रतिशोध मन में ले बैठा।
ब्राह्मण-भेष में अर्जुन ने
धनुष पर संधान किया।
मत्स्य-नेत्र भेदकर
वरमाला पर अधिकार लिया।
जीत स्वयंवर द्रौपदी संग,
अपने कुटीर की ओर उन्मुख हुए।
बिन बताए माँ को बोले,
"देखो माँ, हम क्या लाए।"
वस्तु समझकर कुन्ती ने
बोली— "बाँट लो पाँचों भाई।"
अग्निपरीक्षा द्रौपदी की
यहीं से प्रारम्भ हो आई।
माँ की आज्ञा पालन हेतु,
पाँचों पाण्डवों में मैं बँटी।
बिन अपराध और क्लेश के,
सबके जीवन में जा मिली।
हुआ आगमन कुलवधू का
हस्तिनापुर के प्रांगण में।
स्वागत-कलश लिए खड़ी गांधारी,
राजमहल के आँगन में।
देख जीवित पाण्डवों को
दुर्योधन का मन खौल उठा।
कुटिल हर्ष-विषाद लिए
धृतराष्ट्र ने जय बोला।
छाया उल्लास, हर्षित समाज,
सुन पाण्डवों की जीत से।
यश कुल का था बढ़ाया,
स्वयंवर को जीतकर।
इन्द्रप्रस्थ का सुकून
कुछ ही पलों में गुजर गया।
फिर चौसर के खेल में,
लाज मेरी बिखर गई।
युधिष्ठिर ने उस खेल में
सर्वस्व अपना गँवा दिया था।
धर्म के नाम पर
दाँव मुझे भी लगा दिया था।
जीत देखकर दुर्योधन ने
ज़ोरों से अट्टहास किया।
भरी सभा के समक्ष
द्रौपदी का उपहास किया।
"दंभ तोड़ना है मुझे
द्रुपद-सुता अभिमानी का।
मान हरना है मुझे
इन्द्रप्रस्थ की उस रानी का।"
विकर्ण ने दुर्योधन से
अनुरोध किया।
द्रौपदी के चीरहरण का
घोर विरोध किया।
"नहीं ज्येष्ठ, यह पाप है,
कुरुवंश के लिए अभिशाप है।"
दुर्योधन तो अज्ञान था,
नीतियों का उसे कहाँ ज्ञान था।
वह तो शकुनि का जाल था,
उसके षड्यंत्र का एक चाल था।
"जाओ दुःशासन, दासी-कक्ष,
घसीटकर लाओ मेरे समक्ष।
दासी है, अब वह रानी नहीं,
कुरुवंश की महारानी नहीं।"
विनम्र निवेदन करती रही मैं,
बेबस और लाचारी से।
मत घसीटो मुझे, दुःशासन,
मैं सिमटी हुई हूँ सिर्फ़ एक साड़ी से।
पर दुःशासन के हृदय में
प्रलयकाल का छाया था।
विनम्रता मेरी उसे कहाँ
रास आया था।
भरी सभा में घसीट मुझे,
अपना ही मान घटाया था।
विश्व-इतिहास के पन्नों पर,
दरिंदों में नाम लिखवाया था।
मूक-बधिर खड़ी रही मैं,
सभासदों के बीच में।
लाज बचाओ हे गोविन्द,
इस पापी, पतित, नीच से।
दशा देख याज्ञसेनी की,
पाण्डव भीतर से विवश हुए।
पर धर्मराज के धर्म के आगे,
उनके गदा-गाण्डीव भी मजबूर हुए।
द्यूतसभा की उस भीड़ में
कोई भी न वीर था।
अंधे राजा के अधीन,
सारे लोग मृत थे।
भीम की भीषण प्रतिज्ञा
भी वहाँ पर मौन थी।
कुलगुरु की सारी नीतियाँ
भी वहाँ पर गौण थीं।
क्रोध, अपमान, प्रतिशोध लिए,
अपने ही परिजनों से दूर हुई।
आग, पानी, पत्थर सहकर,
बारह वर्ष वनवास में रहकर।
फिर एक वर्ष अज्ञातवास,
छिपाकर अपना सारा राज।
पाण्डवों के सुख-दुःख के संग,
बिताई मैंने काली रात।
सारे दुःख-क्लेश भुलाकर,
माधव को शान्तिदूत बनाकर।
दो इन्द्रप्रस्थ या युद्ध करो,
कुछ तो अपनों की मान रखो।
पर विध्वंश हस्तिनापुर पर छाया था,
शान्ति-संदेश दुर्योधन को न भाया था।
तब पाण्डवों ने ललकार किया,
गदा-गाण्डीव से प्रहार किया।
कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी पर,
कौरवों का संहार हुआ।
हाँ, ये सच है,
महाभारत का कारण मैं कही गई।
पुरुषों के अहंकार से,
घायल मैं ही हुई।
पर इसका मुझको खेद नहीं,
सुख-समृद्धि से मेरी मेल नहीं।
मैं स्त्री-अस्मिता का दर्पण थी,
अपने स्वाभिमान पर अर्पण थी।
यह कथा नहीं
सिर्फ़ एक द्रौपदी नारी की।
यह तो है अपमान के विरुद्ध
समस्त नारियों की लाचारी की।
अपने स्वाभिमान की लड़ाई,
तुम द्रौपदी बन लड़ना।
दुर्योधन-दुःशासन चारों ओर बाधक हों,
तो कृष्ण जैसा एक साधक रखना।
- नूतन झाl
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