ये शाम, ये शराब, ये शबाब, चाहे मयखाना सजा दो,
एक तरफ उनकी आँखें रख दो, और ये सब कुछ हटा दो।
उनकी इक मुस्कराहट के आगे, हर खुशी को भुला दो,
जितने भी जाम रखे हैं महफ़िल में, सब ज़मीं पर गिरा दो।
उनकी नज़रों का नशा काफी है, और न साक़ी बुला दो,
आज बस उनका दीदार हो, बाकी हर रस्म मिटा दो।
चाँद, सितारे, गुल, महक—सब पर्दे में छुपा दो,
उनके चेहरे की रौनक के आगे, सारी दुनिया झुका दो।
इश्क अगर यही इबादत है, तो हर सज़ा उन्हें बना दो,
एक तरफ उनकी आँखें रख दो, और ये सब कुछ हटा दो।
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