मोहब्बत में कभी ऐसा भी एक मंज़र निकल आया,
जिसे चाहा था शिद्दत से, वही पत्थर निकल आया।
तुम्हारी याद की ख़ुशबू अभी तक दिल में महके है,
कि जैसे बंद कमरे से कोई दफ़्तर निकल आया।
किताब-ए-ज़ीस्त को खोला तो पाया नाम बस उसका,
लकीरों के मुक़द्दर से मेरा रहबर निकल आया।
जहाँ समझा था मैंने एक मरु'थल प्यास का अपनी,
उसी सहरा की मिट्टी से कोई सागर निकल आया।
हुई जब पीर बेक़ाबू तो रोया रात भर खुलकर,
मगर अश्कों की ज़द से भी वही पैकर निकल आया।
छिपाकर ज़ख़्म सीने में, हँसा था मैं ज़माने पर,
उधर कुरता हटा जो तो लहू बाहर निकल आया।
ग़ज़ल का आख़िरी मिसरा कहे है अब 'नवीं' तुमसे,
दुआ को हाथ जो उट्ठा तो वो अंदर निकल आया।
- प्रेमयाद कुमार नवीन
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