बाँह मरोड़ क्रूर बने, होता तलाश छीन।
लाचारों का तंत्र ये, लोग बजाए बीन।।१।।
भेदी भीतर छिप रहे, बाहर कड़े विधान।
कुर्सी पर सोते रहे, मंत्री और प्रधान।।२।।
भैंस आगे बीन बजे, बाजी लाखों बार।
सीधी बात समझे नहीं, बहरी है सरकार।।३।।
पद को वह छोड़ें नहीं, दें न कोई जवाब।
तख्तों से ऐसे चिपके, जैसे बड़े नवाब।।४।।
जंतर-मंतर पर खुली, अब तो भूख-हड़ताल।
आगे बढ़कर आज तो, युवा ठोकता ताल।।५।।
फँसे लोग कुचक्र में, सोते रहे अर्बाब।
पेपर लीक कर भेदियों, बेचा सबका ख्वाब।।६।।
कागज की जाँचें चलें, बैठें अब कमिटियाँ।
रोते सड़कों पर युवा, बेटों संग बिटियाँ।।७।।
काली रातें कर पढ़ा, खोया दिन का चैन।
बिकती देखी कौड़ियों, अपनी मेहनत रैन।।८।।
झूठे आश्वासन दिए, बहलाया हर बार।
मुकदमों के जाल में, उलझाती सरकार।।९।।
तोड़ेगा हर जाल को, कहता कवि सुजान।
युवा रचेगा देश में, नवीन कीर्तिमान।।१०।।
-प्रेमयाद कुमार नवीन
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