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भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा

                
                                                         
                            भोग छप्पन न चाहतें, खिचड़ी खाएँ श्याम ।
                                                                 
                            
'प्रेम' मगन कर्मा भजे, पूरण करते काम ।।१।।

पुरी धाम पावन हुआ, गूंजे शंख-मृदंग ।
हरी नाम की गूँज से, बदला मन का रंग ।।२।।

सजे चौदह चक्र पे, तालध्वजहि अभिराम ।
भजहु दाऊ बलराम को, पूरण होवहिं काम ।।३।।

बीच बिराजें लाड़ली, पद्मध्वज है पास।
'प्रेम' बहन की छत्र में, भक्तों का विश्वास ।।४।।

छोड़ धाम के ठाट को , दौड़े श्री यदुनाथ ।
कर्मा की खिचड़ी बिना, तृप्त न हो जगनाथ ।।५।।

पावन परम पुनीत पुरी, पाप मिटावत पाथ ।
प्रेम-पिघल पग पग परी, पूजहु प्रभु जगनाथ ।।६।।

नित नूतन नमामि नई , नमित निहारत नाथ।
नेह- नीर नव नम नमो, नमित नवल जगनाथ।।७।।

नित नूतन नव नात नय, निधि नभ नहीं नवीन ।
नेह-नदी नव नाद नत, नहर नाम नवींन ।।८।।
-प्रेमयाद कुमार नवीन
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3 महीने पहले

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