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तन्हाई में तस्वीरों को

                
                                                         
                            जब वहशी हो जाता था मैं
                                                                 
                            
पागलपन दुहराता था मैं

ज़ख़्मों को नासूर बनाकर
इक जादू दिखलाता था मैं

तन्हाई में तस्वीरों को
आईना पहनाता था मैं

तितली से रिश्ता मत रक्खो
फूलों को समझाता था मैं

उसकी आँखों तक इक मंज़र
ख़्वाबों से भिजवाता था मैं

लश्कर में भी अक्सर ख़ुद को
तन्हा-तन्हा पाता था मैं

रात में गाली मिल जाती थी
दिन भर ताने खाता था मैं

आँसू ताज़े कर देता था
ज़ख़्म पुराने लाता था मैं
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एक घंटा पहले

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