हम बिखरे तुम संभालो
इसी बात से एक नई
शुरूवात हुई थी न
फिर कहा गई वो बातें
आज हम बिखरे पड़े हैं
तुम संभालने क्यूं नहीं आते
आज हम अनसुलझे से लग रहें
दुनिया के सवालों के सामने
तुम सुलझाने क्यूं नहीं आते
आज हम अकेले से लग रहें
तुम साथ देने क्यूं नहीं आते
हम बिखरे तुम संभालो
इसी बात से एक नई
शुरूवात हुई थी न
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X