आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गलतियों का एक सार

                
                                                         
                            जीत की तड़प में हमेशा,
                                                                 
                            
जीत की आग ही सुलगती क्यों?
अगर परिणाम आने से डरते हैं,
तो अपनी जीत की एक, आस ही क्यों?

परिणाम एक अंक नहीं,
गलतियों का एक सार है!
कहते जीतेंगे हम...
लेकिन उसमें भी शंका की आग हैं|

सहमा दिल है...
लेकिन उसमें भी एक आस है?
सोचता जीतूँ या ना जीतूँ,
लेकिन उसमें भी हर पल, एक त्रास है

क्यों वह नहीं जो प्रश्न से उत्तर करे?
क्यों वह है जो उत्तर से एक प्रश्न ढले?
करता मन को यह विचलित पूरा...
लेकिन उसमें भी जीत की एक प्यास है

सोचता जब मैं आहें भर के,
कहता मन से खुल करके—
अच्छा होगा स्वीकारना इस पल का खुला परिमाण,
क्योंकि यही है जीवन का एक कटु प्रमाण!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर