जीत की तड़प में हमेशा,
जीत की आग ही सुलगती क्यों?
अगर परिणाम आने से डरते हैं,
तो अपनी जीत की एक, आस ही क्यों?
परिणाम एक अंक नहीं,
गलतियों का एक सार है!
कहते जीतेंगे हम...
लेकिन उसमें भी शंका की आग हैं|
सहमा दिल है...
लेकिन उसमें भी एक आस है?
सोचता जीतूँ या ना जीतूँ,
लेकिन उसमें भी हर पल, एक त्रास है
क्यों वह नहीं जो प्रश्न से उत्तर करे?
क्यों वह है जो उत्तर से एक प्रश्न ढले?
करता मन को यह विचलित पूरा...
लेकिन उसमें भी जीत की एक प्यास है
सोचता जब मैं आहें भर के,
कहता मन से खुल करके—
अच्छा होगा स्वीकारना इस पल का खुला परिमाण,
क्योंकि यही है जीवन का एक कटु प्रमाण!
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