काठ के सिंहासन पर माटी का शरीर,
निश्चिंत निर्भीक काया, ना कोई भय ना पीर ।
ना पीर कोई, ना मोह जो उसको टोक सके अब,
नियति ने रचा बिछोह, क्या कोई रोक सके अब।
कोई रोक सकेगा क्या अब इस शरीर को धूमिल होने से,
जब रोक नहीं पा रहा कोई नयनों को अश्रु खोने से।
वो लाल, जिसे माता ने अपने रक्तकणों से सींचा था,
वो गौरव, जिसे पिता ने अपने बाहुपाशों में भींचा था।
वो भाई, बहन के लिए जो एक अटूट कवच था,
वो पिता, जो नन्हें स्वप्नलोक का जीता जागता सच था।
वो पति, जो अपनी ब्याहता का, मां, पिता, मित्र संसार था।
मेहँदी, चूड़ी, बिछिया, पायल और माथे का श्रृंगार था।
वो मौन पड़ा है आंखें मूंदे, श्वेत वस्त्र में लिपटा है,
कोई जाने नहीं दे रहा उसे, हर कोई उससे चिपटा है।
वो जो चेहरे पर मुस्कान लिए है, उसका यह त्योहार है,
अब अंतिम क्षण के अंतिम दर्शन, अंतिम यह संस्कार है।
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