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अज़ल हर रूठना उसका मोहब्बत ही तो है शायद

                
                                                         
                            मेरी हर बात ही उसको ख़ता मालूम होती है
                                                                 
                            
ज़रा सा आज वो मुझसे ख़फ़ा मालूम होती है

बिना देखे उसे अब दिल कहीं मेरा नहीं लगता
जो गर वो रूठ जाए तो सज़ा मालूम होती है

कभी वो इश्क़ में मेरे लुटाती ख़ुद को है लेकिन
कभी अंदाज़ से वो बेवफ़ा मालूम होती है

ज़ुबाॅं की धार से उसने किया मंज़र ख़फ़ा ऐसे
कि ख़ामोशी हमें कोई दवा मालूम होती है

बलाओं से जो मेरी जान हर दम बच निकलती है
ये मेरी माँ की ही मुझ पर दुआ मालूम होती है

गिराती है वो पलकों से नज़र के जाम जब अपने
झुकीं उसकी निगाहें मय-कदा मालूम होती हैं

बुलाकर थक गए हैं हम मगर, आई न मिलने वो
हमें अब शख़्सियत से वो ख़ुदा मालूम होती है

अज़ल हर रूठना उसका मोहब्बत ही तो है शायद
मुझे नाराज़गी उसकी अदा मालूम होती है

--निशान्त शुक्ल 'अज़ल'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 minutes ago

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