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मन पवन संग उड़ चला

                
                                                         
                            मन पवन संग उड़ चला
                                                                 
                            

उषाकाल ने जब आँचल लहराया,
सुवासित सुगंधित महका जग सारा।
उदयाचल से तब दिनकर आया,
भोर सुनहरी संग अलसायी आँखों को खोला।।
रवि-रश्मि ने तब तन-मन धोया,
तन महक उठा, मन बहक उठा।।
मन पवन संग उड़ चला….

शबनम से आच्छादित वसुधा,
कल-कल निनाद से गूँजित सरिता निर्झर।
हरी-भरी धरा की छटा निराली,
अंबर में छायी सिंदूरी लाली।।
तन-मन में छायी खुशिहाली,
तन खिल उठा मन खिल उठा।
मन पवन संग उड़ चला….

खिलती कलियाँ, मंडराती तितलियाँ,
खग-विहग का कलोल कलरव।
वन्यजीवों का रमणीय वन-कानन,
भ्रमरों के गुंजार से गूँजित उपवन।।
मयूर - नृत्य से मोहित मधुवन,
तन झूम उठा, मन नाच उठा।
मन पवन संग उड़ चला….

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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