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अंधकार कहाँ कभी टिकता

                
                                                         
                            अंधकार कहाँ कभी टिकता
                                                                 
                            

चाँद बड़ा ही मतवाला,
घोर-तिमिर हरने वाला।
आसमान में तारे कितने,
पर जग का तिमिर न हर पाते।।
चाँदनी की शीतल किरणों संग,
चाँद जब राजा बन आ जाता है।
अंधकार में डूबे जग को,
रौशन-रौशन कर जाता है।।
भीषण-गर्मी की तपती-ज्वाला से,
शीतल-शीतल कर जाता है।
भेदभाव किसी से कभी न करता,
कोई धर्म, जाति नहीं देखता।।
उसके लिए न गरीब और न अमीर होता
न कोई छोटा और बड़ा होता।।
स्वार्थ कभी न उसका होता,
जगहित में सब को रौशन करता।।
नए जोश, नए उत्साह से,
परहित में सबको शीतल करता।
हम सबको यह सिखला जाता,
अंधकार कहाँ कभी टिकता।।
कितना भी घोर अंधकार हो,
रौशनी को रोक नहीं सकता….

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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