समय की देहरी पर भारत
समय की देहरी पर बैठा
भारत आज स्वयं को पढ़ता है।
उसकी आँखों में हिमालय का धैर्य है,
पर पलकों पर अनकहे प्रश्नों की बर्फ़ जमी है।
आकाश ने ओढ़ लिया है
धुएँ का अनिश्चित वस्त्र,
और दिशाएँ
अपने ही प्रतिध्वनि-पात्र में
उत्तर खोजती फिरती हैं।
राजप्रासादों की दीवारों पर
उत्सव के रंग अब भी ताज़ा हैं,
किन्तु पगडंडियों की धूल में
किसी किसान की प्रतीक्षा,
किसी विद्यार्थी का स्वप्न,
किसी माँ की चिंता
धीरे-धीरे राख होती जाती है।
शब्दों के बाज़ार में
घोषणाएँ बहुत बिकती हैं,
पर सत्य—
वह अब भी किसी संत की कुटिया में
दीपक-सा टिमटिमाता है।
हिमगिरि की निस्तब्ध गोद से
एक तपस्वी उठा—
सोनम वांगचुक।
उसने हथियार नहीं उठाए,
उसने भूख को ही
लोकचेतना का शंख बना दिया।
उसका उपवास
किसी देह का क्षय नहीं,
एक सभ्यता की अंतरात्मा का
मौन महाभाष्य है।
सत्ता!
तुम्हारी विजय तब पूर्ण होगी
जब सिंहासन से पहले
जनविश्वास सुरक्षित होगा।
क्योंकि मुकुट का स्वर्ण
क्षणभंगुर है,
पर विश्वास की आभा
युगों तक राष्ट्र का मस्तक आलोकित करती है।
भारत!
तू केवल इतिहास का गौरव नहीं,
भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
तेरी शक्ति जयघोषों में नहीं,
असहमति को सुन लेने की विनम्रता में है।
आओ,
हम ऐसा प्रभात रचें
जहाँ प्रश्नों को कारा नहीं,
संवाद मिले;
जहाँ अनशन
किसी विवशता का प्रतीक न बने,
बल्कि न्याय
हर नागरिक का सहज अधिकार हो।
तभी हिमालय फिर मुस्कुराएगा,
नदियाँ अपने गीत लौटाएँगी,
और तिरंगे की प्रत्येक लहर
केवल विजय नहीं,
विश्वास का भी उत्सव बनेगी।
-नीलचित्रा व्यास
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