जलधि की निस्सीम नीरवता में
जब दिशाएँ अपने ही प्रतिबिंब से भयभीत हो उठीं,
और आकाश ने
धूसर मेघों का मौन आवरण ओढ़ लिया,
तब एक क्षीण-सी पतवार ने
प्रलय के अधरों पर
पुरुषार्थ का प्रथम गीत लिखा।
वह काष्ठ नहीं—
संघर्ष की तपःपूत चेतना थी,
जो भाग्य की निद्रामग्न लहरों को
कर्म का स्पर्श देकर जगा रही थी।
भँवरों ने अनेक बार
उसके अस्तित्व को निगलना चाहा,
पर वह हर बार
आस्था की उँगलियाँ थामे
और अधिक गहराई से
जल के हृदय में उतरती गई।
नाव तो केवल
स्वप्नों का एक क्षणभंगुर आकार थी,
किन्तु पतवार—
मनुष्य के अदम्य संकल्प का
अमर हस्ताक्षर।
किनारे कभी
जल की कृपा से नहीं मिलते;
वे उन हथेलियों की साधना हैं
जिन्होंने पीड़ा को परिश्रम,
और परिश्रम को प्रार्थना बना दिया।
जीवन की प्रत्येक नदी में
यदि विश्वास नाव है,
तो पतवार वह मौन ऋचा है
जो अनगिनत विपरीत धाराओं के मध्य भी
मनुष्य को स्वयं तक पहुँचने का पथ दिखाती है।
इसलिए
लहरों से भयभीत मत हो;
अपने भीतर की पतवार को पहचानो—
वही तुम्हारे अस्तित्व का दीप है,
वही तुम्हारी यात्रा का यज्ञ,
और वही उस पार
प्रतीक्षारत उजास का प्रथम स्पंदन।
-नीलचित्रा व्यास
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