विश्व अलौकिक सुंदर भारत,निर्मल गंग बहे मन भावन।
स्नान करे इसमें सब आकर, गंग बड़ी यह पाप नशावन।।
पाप समाहित गंग करे हृद,मोक्ष मिले नित गंग नहावन।
निर्मल गंग सदा भव तारण,शीतल है इसका जल पावन।।
निर्मल गंग मिले जब सागर,संगम तीर्थ मनोहर वंदन।
धारण गंग किए शिव मस्तक,देव सभी करते अभिनंदन।।
है गतिमान प्रवाह निरंतर,बुद्धि विवेक करे तब मंथन।
मुक्ति प्रदायक कंचन निर्मल,दूषित हो करती अब क्रंदन।।
निर्झर निर्मल गंग कहे सुन, मैल कुचैल गलीज धरो मत।
गंग विलाप करे अब बेहद,देख विचार करे सब संतत।।
निर्मल गंग भरे जब गंधक,तर्पण के बिन मानव की गत।
श्राप बनो मत देव धरा पर,मान रहे सब संतन का सत।।
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