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बचपन की वो याद पुरानी

                
                                                         
                            बचपन की वो याद पुरानी, आज नींदों में आ गईं नानी...
                                                                 
                            
दीपावली के बीते दिन चार, चले हम सब छठ घाट,
लड़के वो हमारे सहपाठी, बड़े-बुज़ुर्ग, छोटे सब साथी।
ले नाम भगवान का, बनाएँ घाट छठी धाम का,
थोड़ी मस्ती भी कर लेते थे, पानी में छुपन-छुपाई भी खेल लेते थे।
होड़ लग जाती थी, शोर मच जाता था,
किसका घाट बने सुंदर, पूरा ज़ोर लगाया जाता था,
सब एक से बढ़कर एक काम करने को जाने जाते थे।
यह बात बस कुछ घंटों की रहती,
जब सब छठव्रती आते, तो मंज़र सुंदर-सुंदर सा हो जाता,
पवित्र कमल के मोह में सब खो जाता।
बच्चों की ख़ुशी पटाखों में—
फुलझड़ी, अनार और रॉकेट के निशानों में।
शाम अरघ दे लौट आए, बना नाश्ता खाने को,
आँगन में बिछी कई चटाइयाँ, लगे तकिए, लगीं रज़ाइयाँ,
कुछ देर चलीं बातें पुरानी, घर के क़िस्से और कहानी...
फिर लगी फ़िल्म पुरानी,
बिना छत के उस आँगन में, एक परिवार मिलता था,
ना जाने कितने समय के बाद मिलता था...
बचपन की वो याद पुरानी, आज नींदों में आ गई नानी...
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2 घंटे पहले

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