हास्य कविता : पप्पी....
मेरे घर के सामने ही
तुम रहती हो
कितनी घमंडी न बोलती
न कुछ कहती हो
अपने बालकनी में एक
कुत्ता लेके आती हो
उसके शिर पर अपने नरम
हाथों से सहलाती हो
उसको बहुत ही
अहमियत देती हो
दो तीन बार तो तुम
उसकी पप्पी लेती हो
तुम्हारे घर के सामने मैं लक्का
जवान देखती भी नहीं
अपनी वो तिरछी नजर मुझ
पर फेंकती भी नहीं
तुम घुसैल कितनी
कड़की हो
समझ नहीं आता कैसी
लड़की हो ?
काश मैं लड़का न हो कर
तुम्हारे घर का कुत्ता होता
कम से कम वो तुम्हारा
प्यार और पप्पी मैं ही पाता
कम से कम वो तुम्हारा
प्यार और पप्पी मैं ही पाता.......
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