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नादानियां

                
                                                         
                            वो मेरी हर गलती पर नज़र रखता है,
                                                                 
                            
एक पहलू के सिक्के की तरह,
बातों का हर जवाब भी रखता है।

शब्दों की मोती को मानो,
समुंदर से चुन कर लाया है,
मुझसे कुछ इस तरह उलझता है।

कलम की ताकत सिखाकर,
हौसलों से उड़ान भरता है,
वो कुछ इस तरह आगे बढ़ता है।।

बेड़ियों से बांध खुद को,
बातों से अकड़ा रहता है,
पर नज़रों से ओझल ना होता है।।

हर नादानियों को बखूबी समझ,
एक अनमोल एहसास सजाता है,
कुछ इस तरह दिल को भाता है।।

महबूबा के इश्क़ से परे वो,
किताबों का महल बनाता है,
वो कुछ यूं खुद ही दुनिया बसाता है।।

अनसुनी सी कहानी कोई,
ऐसी पहेली पल में बन जाता है,
कुछ इस तरह अपना हाल बताता है।।

कोई बात ठेस सी लगे तो,
ठहरे पानी में कंकड़ फेंकता है,
फिर खुद को उसी तपिश में रखता है।।

अनकही बातों से रूठता भी,
फिर मनाने का ढोंग रचाता है,
कुछ यूं खुद में ही खुद को उलझाता है।।

तकलीफों का सागर बना के,
हर बार खुद से लड़ता है,
इस कदर खुद में ही विस्मित होता है।।


स्वरचित मौलिक रचना

नेहा यादव
लखनऊ उत्तरप्रदेश


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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