माँ अम्बे का अद्भुत रूप है,
हस्त लिए त्रिशूल, चक्र, शंख,
शक्तिबल, धनुष बाण,ब्रज व
घण्टा, दण्ड, तलवार, फरसा।।
चारों दिशाओं में उजव्वल,
माँ का वंदन प्राख्यात,
चरणों मे स्वर्गलोक है,
माँ की महिमा है विख्यात।।
नौ रूप धारण कर माता,
आयी सदा रक्षक बन,
भक्तों की झोली भरने,
आयी माँ जननी बन।।
प्रथमं शैलपुत्री
प्रथम रूप में शैलपुत्री,
आयी हिमालय के गोद में,
दिव्य चेतना के उद्भव,
भक्ति के सर्वोत्तम शिखर में।
सती रूप में विख्यात है,
प्रभु शिव के आराध्य रूप में।।
सर्वव्याप्त,सर्वश्रेष्ठ,अपार,
ऊर्जा अनन्त है शक्तिबल में।।
श्लोक- वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||
द्वितीयं ब्रह्मचारिणी
दाहिने हाथ में जप की माला,
बाएँ हाथ में कमण्डल लिए,
तप का आचरण करने वाली,
विष्णु यश घर में जन्म लिए।।
श्लोक- दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु | देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||
तृतीयं चन्द्रघण्टेति
तृतीय रूप में चंद्रघंटा,
मस्तक पर चन्द्रमा शोभे,
अलौकिक दिव्य सुगंधियों,
ध्वनियों की माँ हैं भंडार,
साधक को करती आगाह,
जिसे होती माँ शरण की चाह।।
श्लोक- पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||
कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
कुष्मांडा माता अम्बा,
सृष्टि की आदि-स्वरूपा,
जननी रक्षक माँ भवानी,
सूर्यमंडल के भीतर लोक में,
मां अष्टभुजी की छावनी।।
क्षमता और शक्ति की देवी,
देह दिव्य, कांति व प्रभा,
सिद्धियों निधियों की भंडार,
सूर्य समान दैदीप्यमान है।।
श्लोक- सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
पंचमं स्कन्दमातेति
करती सिंह सवारी हैं,
स्कन्दमाता दैवीय शक्ति है,
ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति,
कर्म व ज्ञान का स्त्रोत हैं।।
शिव तत्व आनंदमय शान्त,
शक्ति, ज्ञान शक्ति और
क्रिया शक्ति का समागम,
त्रिशक्ति में समर्पण हैं,
कार्तिकेय (स्कंद) नाम से
विख्यात माँ स्कंदमाता हैं।।
श्लोक- सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया | शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||
षष्ठं कात्यायनीति
समस्त इन्द्रियों में समाहित,
कल्पना से भी परे शक्तिबल,
एवं अद्भुत विशाल है।।
अदृश्य,अव्यक्त सूक्ष्म जगत,
जो कात्यायनी माँ में समाहित,
गुप्त रहस्यों की सूचक हैं।।
महर्षि कत्यायन पर प्रसन्न हो,
पुत्री रूप जन्म धरा पर लेकर,
दानवघातिनी माँ कात्यायनी हैं।।
श्लोक- चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन ।कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥
सप्तमं कालरात्रीति
संम्पूर्ण सृष्टि में सबसे,
भयावह व उग्र रूप में,
संकटों का नाश करने वाली,
मातृत्व को समर्पित है।
ज्ञान और वैराग्य की देवी,
मां कालरात्रि दिव्य शक्ति है।।
श्लोक- एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||
महागौरीति चाष्टमम्।।
हस्त त्रिशूल धारण किए,
शक्ति अमोघ संगृहीत माँ में,
सद्यः फलदायिनी माँ अम्बे के,
पूर्वसंचित से पाप भी सारे,
विनष्ट हो जाते हैं,
उपासना कर माँ जगदम्बे का,
पाप कल्मष धूल जाते हैं,
पवित्र और अक्षय पुण्यों की,
जननी माँ यही महागौरी हैं।।
श्लोक- श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः | महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा
नवमं सिद्धिदात्री
अद्भुत सिद्धि, क्षमता,
प्रदान करती माँ सिद्धिदात्री,
विचार मात्र से संपूर्ण कार्य,
सिद्ध हो पूर्ण हो जाते हैं,
सत्य वचन जग भलाई का,
सिद्धि का यश देने वाली,
पूर्णतः कार्य संपन्न कर,
मां सिद्धि प्रदान करने वाली हैं।।
श्लोक- सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयाात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
श्लोक- ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिकेशरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते !!
नवरात्रि के इस पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं व मंगलकामनाएं।माँ अम्बे सभी के इच्छाओं की पूर्ति करें व जग का कल्याण करें।।
जय माता दी।।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X