माँ का जब सिर से छूटा साया, मन में गहरा दर्द समाया,
ममता के उस टूटे बंधन ने, प्रभु का मार्ग दिखाया।
माँ की याद हृदय में लेकर, निकले ईश्वर की तलाश,
दुनिया के सारे मोह त्यागकर, थामा भक्ति का विश्वास।
राम नाम की धुन में जिनका, जीवन सारा बीता,
हनुमत भक्ति के प्रकाश से, हर मन अँधियारा जीता।
बचपन में ही पिता ने उनको, विवाह बंधन में कर डाला,
बाल मन था, संसार समझना, फिर भी रिश्ता निभा डाला।
समय बीता, गौना आया, जीवन ने नया मोड़ लिया,
पर मन ने सांसारिक बंधन से, अपना नाता तोड़ लिया।
पत्नी के संग गृहस्थ जीवन का, मार्ग उन्हें रास न आया,
मन में उठती प्रभु की पुकार ने, अपना पथ दिखलाया।
न धन चाहा, न मान चाहा, बस सेवा का पथ पाया,
दुखियों के आँसू पोंछ-पोंछकर, प्रेम का दीप जलाया।
कैंची धाम की पावन धरती, आज भी कथा सुनाती,
बाबा की सरल मुस्कान वहाँ, भक्तों को राह दिखाती।
बाबा कहते थे—सेवा ही पूजा है, प्रेम ही सच्चा ज्ञान,
हर जीव में प्रभु को देखो, यही था उनका विधान।
हनुमान के चरणों में जिनका, तन-मन अर्पित था,
राम-नाम ही जिनकी साँसों में, हर पल समर्पित था।
आज नहीं हैं देह रूप में, फिर भी साथ निभाते हैं,
जिस मन में श्रद्धा जागे, वहाँ बाबा मुस्काते हैं।
बाबा की भक्ति प्रेम सिखाए, सेवा जीवन का सार,
हनुमान अंश बनकर जग में, अमर हुआ उनका विचार।
- नेहा कुमारी
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