समझ नहीं आता, मनुष्य क्यों जीवन भर तड़पता है
एक दिन श्मशानों में वह अपनों से ही जलता है ।।
जिंदा रहते रहते वो, सेवा के लिए तरसता है ,
मरने के बाद औलाद क्यों, बारह दिनों का ढोंग रचता है
काश जीते जी वो, सेवा उसकी कर पाता ,
तो अंत समय में, वह इतना दुःख ना पाता ।।
उस बुजुर्ग कंकाल की, क्या कहानी मैं आज कहूं,
जीते –जी कहता था, किसके लिए मैं जिंदा रहूं
मर गया आज वह, उसकी क्या मैं कथा कहूं
जिसका पुत्र ही उसे आग नहीं दे सका, उसकी क्या मैं व्यथा कहूं...।।
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