के वो खामोश पथ और तेज हवाएं
कड़कती बिजलियां सावन की बरसात थी
ना जाने वो कौन सी रात थी
ना आँखों में चैन ना दिल को करार
उन दिनों की किया बात थी
ना जाने वो कौन सी रात थी
मैं फिरता अकेला रातों का राजा
और कोई नहीं बस रानी मेरे साथ थी
ना जाने वो कौन सी रात थी
कभी खुशियों का सरगम,तो आज गम का मेला भी
मेरी तन्हाइयों से निकली कोई बारात थी
ना जाने वो कौन सी रात थी
मैं ना हारा कभी था अंधेरों का सिकंदर
तब बाजी मेरे हाथ थी
ना जाने वो कौन सी रात थी
-नीटू मावी
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