के थका नहीं मन मेरा
ए जीवन कितना भगा ले तू
हर बार मैं गिरकर उठा हूं
सोते सोते जगा ले तू
माना के मंजिल दूर है मेरी
पर पहुंच से भी तो दूर नहीं
राह कठिन है मंजिल की
अब रुकना भी तो मंजूर नहीं
-नीटू मावी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X