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खुदगर्ज़ ज़माना

                
                                                         
                            के आज के जमाने में मावी रिश्ते कहां है
                                                                 
                            
कोई बताओ तो सही फ़रिश्ते कहां है

ये खुदगर्ज़ ज़माना यहां बेरहम लोग
गरजते तो बहुत है पर बरसते कहां है

पड़ोसी नहीं अब दुश्मन है कबीलों में
छूट गई राम राम अब नमस्ते कहां है

गूलर ना खरीद सका गुरबत में इंसान
दाम तो उचित थे पर सस्ते कहां है

गहरे हैं शांत लोग ज़रा बचकर रहना
ये मुस्कुराते तो है पर हंसते कहां है
-नीटू मावी
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एक घंटा पहले

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