के एक मुसाफिर शोर सुने
शांत शांत सा मोर कुहे
कोई मानस मंद सा हिंके है
कोई जोर जोर से चींखें है
अगल बगल ना दूर दूर
है चारों दिशाएं नूर नूर
ये कैसा विघ्न दिशाओं में
कोई रोता लगे चिताओं में
एक डर भयानक सा लगता
एक दर्द अचानक सा लगता
खड़ा मुसाफिर चिता निहारे
बता मुसाफिर कहा चला रे
क्यों तू इतनी दूर खड़ा
एक बात है गहरी सुन जरा
मेरे मन की बातें रुकी रुकी
मैं मरता मरता दुखी दुखी
कैसे कहूँ के चिता ना रोए
आ बैठ धरा पर पास मेरे
घर में सयानी बेटी रोए
मां का दुख ना थोड़ा है
भार्या भाग्य सा फोड़ा है
मासूमियत चीखती चिता रुलाए
बेईमान जुलुम ने कहर बरसाए
गहरा समुद्र हृदय पिता का
तोड़ बांध सब दिशा बहाए
मन हृदय का मेल ना खाता
जब पिता पुत्र की चिता जलाए
-नीटू मावी
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