आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

करुण रस

                
                                                         
                            के एक मुसाफिर शोर सुने
                                                                 
                            
शांत शांत सा मोर कुहे
कोई मानस मंद सा हिंके है
कोई जोर जोर से चींखें है

अगल बगल ना दूर दूर
है चारों दिशाएं नूर नूर
ये कैसा विघ्न दिशाओं में
कोई रोता लगे चिताओं में

एक डर भयानक सा लगता
एक दर्द अचानक सा लगता
खड़ा मुसाफिर चिता निहारे
बता मुसाफिर कहा चला रे

क्यों तू इतनी दूर खड़ा
एक बात है गहरी सुन जरा
मेरे मन की बातें रुकी रुकी
मैं मरता मरता दुखी दुखी

कैसे कहूँ के चिता ना रोए
आ बैठ धरा पर पास मेरे
घर में सयानी बेटी रोए
मां का दुख ना थोड़ा है
भार्या भाग्य सा फोड़ा है

मासूमियत चीखती चिता रुलाए
बेईमान जुलुम ने कहर बरसाए
गहरा समुद्र हृदय पिता का
तोड़ बांध सब दिशा बहाए
मन हृदय का मेल ना खाता
जब पिता पुत्र की चिता जलाए

-नीटू मावी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर