आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बदलती दुनिया

                
                                                         
                            लगता है नदियों के किनारे बदल गए
                                                                 
                            
देखने का फर्क है या नज़ारे बदल गए

लहरें भी शांत है और कश्ती भी चुप
हवाएं बदली है या सहारे भी बदल गए

मुझ से कहती है घर की खामोश दीवारें
दुशमन ही बदले है या प्यारे भी बदल गए

ना डगर की खबर ना मंज़िल का पता
राहें ही बदली है या दुआरे भी बदल गए

अब ना छांव है दूर तक ना डेरा है कोई
कबिले ही बदले है या बंजारे भी बदल गए
-नीटू मावी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर