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अँधेरों से उजालों तक

                
                                                         
                            के बिक गया जो शहर बाकी था,
                                                                 
                            
लुट गया कुछ अमन बाकी था
जिंदगी ने इतना बोझ दिया
झुक गया कुछ कर्ज बाकी था

जिंदगी यूं चल रही
खुद की नजरों ने डंसा हमे
ना चाहत थी जिन कर्मों की
उन्हीं कर्मों ने कसा हमें

सोचा था कुछ सही करेंगे
सब कुछ आसा लगता था
विपरीत सोच से भाग्य चला
ये कैसी मिली सजा हमें

जितना पैर चलाया हमने
उतना दल दल निगल गई
बीच भंवर ना जोर चले
लगे जिंदगी हाथों से फिसल गई

तन मन धन से काम किए
ना मंजिल कोई राह मिली
कितने पर्चे लेगा जीवन
कोई सहारे की ना बांह मिली

उम्मीद लगी थी उस कल की
जो मैने कभी देखा ही नहीं
बीत गया एक लंबा सफर
कल्प की कोई रेखा नही

चारों तरफ अंधेरा है
अब राह कोई खुली नहीं
चलते चलते निकले आंसू
हर पग सी कोई शूली नहीं

तलाश है उस तिनके की
जो डूबे का सहारा बनता है
बाहों में भर लू कस के उसको
जिंदगी का किनारा बनता है

फिर से उड़ान ऊंची रहेगी
पंखों को संजोना सीख गया
नजरों की है धार चील सी
लोगों को समझना सीख गया

रिश्ते नाते झूठे जग के
संसार में अपना कोई नहीं
फूटे भाग हो रुठे ईश्वर
यहां हालत जाने कोई नहीं
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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