अब वो सच बचा नहीं है।
जिसे झूठ ने रचा नहीं है।
ख़ामोश आहट है उसकी,
कोहराम जो मचा नहीं है।
भटके मुद्दे,लावारिस चर्चा
ये टीवी हमे जचा नहीं है।
नाराज फूफा, कुर्सी मांगे,
खाया है वो पचा नहीं है।
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