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तब भी आम आदमी हाथ मलता था और अब भी मल रहा है।

                
                                                         
                            चोरों ने चोरों के हक में रचा है
                                                                 
                            
एक उन्मुक्त षड्यंत्र।
और कमाल ये है कि
हम इसी को मान रहे हैं लोकतंत्र।
व्याख्यायें खल रही हैं।
शब्दावली जल रही है।
देश से बड़ी होती सियासत,
देश को ही निगल रही है।

पता ही नहीं चलता,
कौन किसकी पोल खोल रहा है।
कौन झूठ,
और कौन सच बोल रहा है।
सड़कों पर अजीब कच कच।
नेता जितना बोला,
उतना ही भक्तों का सच।
अब रील की दुनिया है,
उतना ही सच नहीं होता,
जितना स्क्रीन पर दिख रहा है।
सच वो भी है, जो पर्दों के पीछे,
बाजारों में बिक रहा है।
सत्ता बदलने से
देश का भाग्य नहीं बदलता है।
सत्ता का स्थायित्व भी कुछ लोगों को खल
रहा है।
पीठ पर बारुद उनके ,
कहते है देश जल रहा है।
लेकिन एक शाश्वत सत्य ........!
तब भी आम आदमी हाथ मलता था और अब भी
मल रहा है।
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45 मिनट पहले

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