सियासी मुद्दे तो वजनदार है पर बड़े हल्के किरदार है।
किसी का खुलने से,किसी का बंद सड़क कारोबार है।
नौकरी नही इसलिये कोई इज्जत न घर पर न बाहर,
दोस्त करता है इज्जत क्योंकि वो ख़ुद बेरोज़गार है।
मिर्च मसाले से सनी खबर मे रेजीम चेंज का सपना,
राजनीति मे अदृश्य जड़ तो मिडिया और अख़बार है।
लिखने को लिख तो रहे है कई कलमकार मेरी तरह,
पर न शरद जोशी का प्रहार न परसाईजी की धार है।
न मै तनाव में चुनाव न ही चुनाव में तनाव देखता हूं,
मै इस माटी को चूमता हूं , मुझे इस माटी से प्यार है।
ब्राज़ील मे जीत का जश्न तमाचा है उनके के मुंह पर,
नाम सोशल मीडिया जहां एल्गोरिदम ही हथियार है।
-जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X