मगरूर शेखचिल्ली की जिसने सुरत बिगाड़ी है।
वो अमरीकी मागा नही ,वो फारस की खाड़ी है।
ये ज़िंदा-दिल बेवक़ूफ़ सत्ता के शीर्ष पर है और,
इसकी बदनियति ने मग़रिबी बस्तियां उजाड़ी है।
अब ये किताब बदल दो इसमें मुनाफा नही बचा,
क़भी तो तुमने ये लहराई है और कभी फाड़ी है।
तुम खामख्वाह मूंछ के भ्रम से उसे धमकाते हो,
ये मत भूलना कि उसके पास पकी हुई दाढ़ी है।
बहुमत के फैसले सड़क पर सिक्का उछाल कर,
सियासत के ये खिलाड़ी जम्हूरियत मे कबाड़ी है।
- जयंत दिक्षित
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