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दास्तां ए इंतिशार की अब इंतेहा हो चली है दोस्तों।

                
                                                         
                            कोर्ट में भीतर,बाहर आप दोगली जुबां बोल रहे है।
                                                                 
                            
न्याय की गुहार,फिर न्यायालयों को ही तोल रहे है।
दास्तां ए इंतिशार की अब इंतेहा हो चली है दोस्तों,
बाहरीयों का गम नहीं विभीषणों के बड़े रोल रहे है।
उनका इरादा मुल्क़ को आगाह करना हरगिज़ नही,
वो बस अल्बानिया की आग दिल्ली मे टटोल रहे है।
थाली मे सजे केक सा कटा और बंटा अक्साई चीन,
तुम्हारे इतिहास की चपेट मे अभी तक भूगोल रहे है।
जवाबदेही उनकी भी तय होगी जो जहर उगा रहे है,
तालाब के मुहाफ़िज मगर पानी मे जहर घोल रहे है।
चने भूंजने वाली भट्टी को पहले भाड़ कहते थे लोग,
अब भाड़ मे गये हुये लोग ,सीधे स्वर्ग में डोल रहे हैं।
माना कि तुम बेजोड़ हो,पर सवाल यहां टिकने का है,
झूठे,फ़रेबी इकठ्ठा हुये अपने अपने पत्ते खोल रहे है।
-जयंत दिक्षित
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3 घंटे पहले

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