बार बार ठगा गया, तो ग्राहक कंपनी छोड़ रहा है।
लॉन्चिंग हो नही रही, वो बस ठीकरें फोड़ रहा है।
मोहब्बती इत्र की शीशी में नफ़रत की महक क्यों,
आपका ये देश प्रेम कही देश तो नहीं तोड़ रहा है।
पुरखें तो आसमां तक सुराख़ बनाकर चले गये ,
और ये अब ज़ेर-ए-ज़मीन रास्ता देश जोड़ रहा है।
देश के फ़ैसलें सड़कों पर लिखने की ज़िद है उसे,
मैदान गवां दिया अब मजलिस से मुँह मोड़ रहा है।
- जयंत दिक्षित
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