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शरद पूर्णिमा

                
                                                         
                            जिस चंदा से तुलना करते,हम सब अपने महबूबों की
                                                                 
                            
वो चंदा मेरा सब कुछ है, आशा है मेरे ख्वाबों की
जिससे अगनित रिश्ते मेरे,वो चंदा मेरा मामा है
कभी बाबा है कभी फूफा है, कभी मेरा फटा पजामा है
बचपन से जिसको देख देख ,पाने की इच्छा करता था
क्या पता हमें ये वक्त मेरा, धैर्य की परीक्षा करता था
जब पूर्ण शशि आभामय हो ,सौन्दर्य बिखेरा करता है 
ऐसा लगता है मानो ये, मेरा ही फेरा करता है
जिस चंदा को देख देख, त्यौहार मनाये जाते है
करवा चौथ मे निशा समय, फिर दिये दिखाये जाते हैं
चंद्र से चला फिर चंद्र वंश,गिरिधारी जी अवतारे थे
पावन कुल चन्द्रवंश करके,सब दैत्य गए संघारे थे
चाँदनी रात को देख देख,इंद्री भी हर्षित होती है
विरहिणी निज कन्ता के हित, चंदा को देख के रोती है 
रजनी मे नीरज ने देखा ,किलकोरे चंदा करता है
ऐसा लगता है प्रियतम हित, आँहे तो ये भी भरता है 

- नीरज यादव (खिचडी सम्राट), मिश्रिख सीतापुर
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
4 वर्ष पहले

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