धूप में, बरसात में
छाता सी बन जाती है मां।
आंधी में , तूफान में
चट्टान सी बन जाती है मां।
कभी हमें हंसाती, कभी हमारे लिए
ख़ुद रो जाती है मां।
हमें शिखर पर पहुंचाने के लिए,
कभी संगतकार बन जाती है मां।
हमसे कुछ नहीं मांगती,
बस हमारे लिए भगवान से मांगा करती है मां।
ख़ुद गीले में सोती और भूखी रह जाती,
पर हमें जरूर खिलाती है मां।
अफ़सोस तब होता है, जब बुढ़ापे में
घर का एक पुराना सामान हो जाती है मां।
उससे बोलने को फ़ुर्सत नहीं,
एक बोझ हो जाती है मां।
उसने तुम्हारी लम्बी उम्र की,
हर पल मुरादे मांगी।
पर उसकी ढलती उमर ,
तुमको लम्बी लगने लगी।
मेरी यही गुजारिश सबसे
बस इतना सा काम करो,
मां ने हर क्षण तुम्हें दिया
कुछ क्षण उसके नाम करो।
ख़ुद को ना समझे वो असहाय
दुख तकलीफे छोड़ कर ,
खिलखिलाकर वो हंसे
उम्र के उस मोड़ पर।
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