मैं हूं हिन्दी, मैं हूं हिन्दी
भारत का स्वाभिमान हूं मैं,
भारत का अभिमान हूं मैं,
चलो ले चलूं तुम्हे मैं अपने जीवन की ओर।
मैं हूं हिन्दी , मैं हूं हिन्दी
संस्कृत ने मेरे बीजों को ,
फैला दिया जब इस धरा पर,
मन में जागा संदेह और छा गया डर।
डर था कि अगर ना अपनाया इस देश ने,
खो जाऊंगी इस धरा में ,अपने ही आप में।
पर इस देश के वासियों ने दिया मुझे इतना प्यार,
फूटा अंकुर इस धरा से हुआ दुनिया से मेरा साक्षात्कार।
प्रेम रूपी जल से मुझे सींच कर बड़ा किया,
और जग के सामने मेरे उज्जवल भविष्य को खड़ा किया।
अब मुझे बोलने को सब लालायित होते ,
उत्साहित होते और हर्षित होते।
नेताओं के भाषणों में, अफसरों के अभिवादनों में,
गली में , मोहल्लों में , नुक्कड़ों की सभाओं में ,
बस थी मेरी ही शान और था मेरा ही नाम ।
तभी सहसा मुझे ये आभास हुआ ,
मुझे ये एहसास हुआ,
लोग जा रहे है मुझे छोड़ धीरे धीरे ।
मुझे कुछ समझ ना आया ,
ये परिवर्तन क्यों है छाया
कल तक जो लोग कहते थे मुझे मातृभाषा,
गाते थे मेरी ही गाथा ,
होकर नतमस्तक करते थे मेरा अभिनंदन,
अब वो तोड़ मुझसे बंधन ,
ना जाने चले किस ओर बन ठन।
कौतूहलवश मैंने पीछा किया इन सबका,
समझ आ गया मुझे ये खेल है किसका।
"मैकाले" की अंग्रेजी का जाल
बन गया मेरे लिए जंजाल।
सब अंग्रेजी की ओर भागने लगे,
मुझे छोड़ उसे अपनाने लगे।
करोड़ों देशवासियों के बीच हो गई अकेली,
धीरे धीरे बनने लगी मैं एक पहेली ।
अब मुझे लोग चाह कर भी बोलना नहीं चाहते,
अंग्रेजी को बोलने में ही शोभा पाते।
पर अभी भी मुझमें है एक आस जगी,
करेगा कोई उपाय कहीं ना कहीं ,
समझेंगे मेरे भी महत्व को सभी।
मेरी है ये पुकार हर जन से,
मैं मातृभाषा, करे मुझे स्वीकार सम्पूर्ण मन से।
-- "नीलम कार्की"
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