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वापस मत जाना

                
                                                         
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सच और झूठ की ये कैसी लड़ाई है,
हमारी-तुम्हारी ये कैसी रुसवाई है।
सच जो हम स्वीकार नहीं कर पा रहे,
झूठ कहकर मन को बार-बार रोने से मना कर रहे।
तुम आओगी,
ये झूठ कई बार बोल रहे हैं,
पर सच सिर्फ़ तुम जानती हो—
क्या तुम आओगी या नहीं?
क्या तुम मुझे फ़ोन करोगी या फिर नहीं?
हम झूठ में नहीं जीना चाहते,
हम सच को मानकर जीना चाहते हैं
कि तुम अब इस वक़्त बनारस में नहीं हो।
मैं बस इतना कहना चाहता हूँ—
अबकी आना,
तो वापस मत जाना।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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