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सुबह की बेला

                
                                                         
                            सुबह की बेला
                                                                 
                            
सुबह की किरण ले रही अंगड़ाई है,
चिड़ियों की चीं-चीं
और मुर्गे का कुकड़ू-कूँ
मेरे कानों को तंग कर रहे हैं
और मेरी नींद भंग कर रहे हैं।
उठने का मन नहीं है,
बिस्तर को छोड़ने का मन नहीं है।
फिर भी उठना पड़ा
चाय और दो बिस्किट की खातिर,
क्योंकि ये दोनों भी
मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
चाय भाप बनकर
टेढ़ी-मेढ़ी सी अंगड़ाइयाँ ले रही थी
और मुझसे चुपके-चुपके कह रही थी—
“मैं जा रही हूँ ठंडी होने,
तुम्हें मुझे पीना है तो पी लो,
ज़िंदगी का मज़ा
चार घूँट में ले लो।”
बिस्किट कह रही थीं—
“मैं तो टूटना चाहती हूँ,
चाय की प्याली में भीगकर
अपने आपको खोना चाहती हूँ।”
तब मैंने कहा—
“रुको, मैं उठता हूँ,
तुम सबकी इच्छा पूरी करता हूँ।”
अब मैं बिस्तर छोड़ता हूँ
और अपनी चाय और बिस्किट
हाथ में लेता हूँ।
— नीलम चौरसिया “नील”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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