आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बैठकर मैं तलाशें यहीं पर तुझे

                
                                                         
                            बैठकर मैं तलाशें यहीं पर तुझे
                                                                 
                            
क्या पता तू मुझे छोड़कर बढ़ गया ।
मैं तो बस राह तेरी ही तकता रहा
तू अकेले ही सब सीढ़ियां चढ़ गया ।।
बैठकर मैं तलाशें यहीं पर तुझे..........
सादगी से था चेहरा भरा जो तेरा,
मैं तो थोड़ा सा भी उसको पढ़ ना सका ।
तूने मुझको सिखाई जो अठखेलियां,
फिर ना जाने तू मुझमें यूं क्या पढ़ गया ॥

बैठकर मैं तलाशें यहीं पर तुझे............
मैं तो बस राह तेरी ही तकता रहा.........

राही बनके जो फिरते थे सारा जहां,
आज मैं हूं यहां और तू है वहां ।
साथ चलके भी थकते नहीं थे कभी,
आज मुझको अकेले तू. कर् जड़ गया ।
बैठकर मै तलाशें यहीं पर तुझे..........
मैं तो बस राह तेरी ही तकता रहा........
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर