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वो मेरी डायरी खो गई।

                
                                                         
                            नदिया के घाट से फेंका था तुमने पत्थर,
                                                                 
                            
हिलोरें मेरे मन में किलोल करने लगी थीं,
वो प्रथम दर्शन, महज आकर्षण तो न था।

गूँथी दो चोटियाँ झुलाते, तुम्हारा आना-जाना
तुम्हें ताकना विशेष पाठ्यक्रम सा मेरा अनवरत।
कॉलेज का सत्र, काँपते हाथों का पहला पत्र
स्पर्श से उपजा संवेदन, आकुलता सिक्त मन
चढ़ी हुई त्योरियों संग माथे पर छाया पसीना।
दो भौंहों के मध्य स्थित हरी बिंदी का नगीना।

भावविह्वल आलिंगन, संकोच संग चुंबन
सप्तपदी के गीत, मानस का संगीत,
देहरी से अंदर आते पाँवों के निशान
अंजन से अंजी नयनों की कमान,
चादर की सलवटें, कसमसाए लिहाफ,
सर्द मौसम में मुँह से निकलती भाप,
उसे आईने पर उड़ेल नाम लिखना,
दिखना फिर अचानक छिपना,
तुम्हारा आगमन और प्रस्थान,
यूँ देह से जाता साँसों का विमान।

अणु-अणु व कण-कण,
युग ठहराव सा विदा का क्षण,
फिर बरसों-बरस मेरा जागना,
ज्यों छूटी हुई ट्रेन के पीछे भागना।

नींद आई थी ठहरी भी,
फिर मेरी आँखों में ही सो गई,
लगता है यादें यादों को धो गईं,
और भी जाने क्या-क्या, किंतु
स्मृति अब कुछ विलंबित हो गई
हर दिन संजोया था जिसमें तुम्हारा,
वो मेरी डायरी खो गई।
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2 महीने पहले

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