आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सराबो मिराज़

                
                                                         
                            नासमझी में इन्सान सराबो मिराज़ के पीछे पीछे दौड़ता है
                                                                 
                            
समझ आने पर वह सबसे पहले अपना दृष्टिभ्रम तोड़ता है
सुकून-ए-क़ल्ब की जुस्तजू में रिंदों से है रौनक मयकदे की
नींद खुलने पर ही हर ख्व़ाब हक़ीक़त का साथ छोडता है
-एन आर कस्वाँ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर