बाजलोगों की बग़ैर मंज़िल-ए-मक़्सूद मुसाफ़िरत हुआ करती है
बीच राह किसी मोड़पर उनके सफ़र की आखिरत हुआ करती है
- एन आर कस्वाँ
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