सजी स्वयंवर-सभा जहाँ पर, शौर्य-परीक्षण भारी था,
मत्स्य-नेत्र को वेध सके जो, वीर वही अवतारी था।
तुला-पाद पर चरण साधते, अर्जुन मन में हरषाए,
कौतुक-वश केशव की ओर ही, नयन घुमाकर मुस्काए।
"कदम सधे हैं, दृष्टि सधी है, भुजबल पर विश्वास अटल,
धनु की डोरी खींच बाण से, लक्ष्य भेद दूँ आज प्रबल।
जब इस शर के संधानों पर, केवल है मेरा अधिकार,
फिर क्यों व्यर्थ कहूँ मैं केशव, तुम हो मेरे खेवनहार?"
मंद-मंद मुस्काए माधव, रूप अलौकिक मुस्काया,
"कड़ाह में जल कम्पित विचलित, उसको थामे मेरी माया।
तू प्रत्यंचा खींच धनुर्धर, लक्ष्य साधने वाला मैं,
तेरी हर श्वाँसों में भीषण शौर्य बाँधने वाला मैं,
तू केवल निमित्त है जग में, बाँध न खुद को अभिमानों से,
तेरा बाण मात्र साधन है, साध्य दिलाने वाला मैं।"
तृण-तरु सब निष्प्राण पड़े थे, विष उगल रही थी माटी,
पांडव-दल के सम्मुख फैली, शापित शून्यों की घाटी।
अर्जुन बोले, "धधक रहा जो, विषमय यह पाषाण-पटल,
किस भाँति रचेगा वैभव को, यह शापित खांडव निर्जल?"
हँसकर बोले मधुसूदन तब, "ज्वाला से नव-सृजन रचा,
बंजर की छाती चीर पार्थ, सोए विक्रम का भान जगा।
अग्नि-सा तप, संकल्प जगा तू, साधन स्वयं बुलाऊँगा,
इंद्रप्रस्थ-सी दिव्य पुरी का, द्वार यहीं खुलवाऊँगा।
तू संकल्प उठा पौरुष का, सृष्टि रचाने वाला मैं,
बंजर मरु की छाती पर भी, स्वर्ग उगाने वाला मैं,
तू बस कर्म का बीज लगा जा, डर न सूखी सीमाओं से,
तेरा बाण मात्र साधन है, भाग्य जगाने वाला मैं।"
छिन गया मुकुट, छूटा गांडीव, कैसी यह लाचारी थी,
शूरवीर के पराक्रम पर अब, कंगन-ध्वनि भी भारी थी।
नारी-वेश धरे अर्जुन का, स्वाभिमान जब रोता था,
अंधकार के उस कोने में, धैर्य विचलित होता था।
मन में गूँजी मुरली-धुन तब, "धीरज धर हे सव्यसाची!
तप की भट्टी में जलकर ही, चमकेगी काया सांची।
यह नर्तन भी साधना तेरी, अहंकार गल जाने दे,
यह मौन-तपस्या है तेरी, सुदिन सुयश का आने दे।
तू बस नाच समय की धुन पर, काल चलाने वाला मैं,
तू तो एक नटी है केवल, जग को नचाने वाला मैं,
तू बस धैर्य संजो अंतर में, हार न अपनी पीड़ाओं से,
तेरा बाण मात्र साधन है, राह दिखाने वाला मैं।"
रण-सम्मुख खड़े सगे बंधु थे, रक्त-सम्बन्ध पुकार रहा,
गांडीव गिरा हाथों से सहसा, मन का धीरज हार रहा।
अश्रु-नयन हो पार्थ पुकारे, "यह कैसा संहार प्रभु?
अपनों के शव पर चलकर क्या पाना है अधिकार प्रभु?"
बोले माधव, "मोह त्याग तू, यह माया का जाल घना,
काल ग्रास बन चुके सभी ये, तू बस इसका अस्त्र बना।
धर्म-युद्ध से विमुख हुआ जो, कायर वह कहलाएगा,
तू केवल कर्तव्य निभा जा, कर्म अमर हो जाएगा।
तू प्रत्यंचा खींच धनुर्धर, समर सजाने वाला मैं,
मोह-निशा की काली चादर, दूर हटाने वाला मैं,
तू बस तीर चला अधर्म पर, बाँध न खुद को संशयों से,
तेरा बाण मात्र साधन है, धर्म जिताने वाला मैं।"
धधक रही थी चिता सामने, साँझ ढली जब रण-प्रांगण,
शपथ कठिन थी गांडीवधर की, काँप रहा था कण-कण-तृण।
अभिमन्यु के घाव हृदय में, अग्नि-शिखा बन जलते थे,
पश्चिम की लाली संग अर्जुन की, श्वास यहाँ उखड़ते थे।
चक्र सुदर्शन तान कृष्ण ने, दिनकर को ढक डाला था,
जयद्रथ के सम्मुख फैला, छद्म निशा-उजियाला था।
हटा सुदर्शन, प्रकटा सूरज, केशव गर्जे, "बाण चला!
शीश काटकर उस पापी का, तू भी अपना क्रोध जला।"
तू प्रत्यंचा खींच धनुर्धर, काल घुमाने वाला मैं,
ढलते भानु के भाल-पटल पर, मेघ बिछाने वाला मैं,
तू बस तीर चला जयद्रथ पर, सोच न अपनी सीमाओं से,
तेरा बाण मात्र साधन है, सूर्य उगाने वाला मैं।"
पहिया धँसा हुआ था रण में, कर्ण निहत्था खड़ा वहाँ,
क्षत्रिय-धर्म पुकार रहा था, शस्त्र न उस पर चले यहाँ।
कंपित हाथों से पार्थ मुड़े, "यह कैसा अधर्म होगा?
निहत्थे पर यह बाण चलाना, कैसे पुनीत सत्कर्म होगा?"
बोले केशव गरज-स्वर में, "कहाँ गया था धर्म बता?
अभिमन्यु को घेर मारा जब, किसका था कुकर्म बता?
पाप-घड़े जब भर जाते हैं, दया-भाव तब विष बनता,
उठा धनुष संहार कर उसका, यही न्याय का पथ बनता।"
तू संधान लगा प्रत्यंचा, न्याय दिलाने वाला मैं,
अधर्म के उस मस्तक पर अब, दण्ड गिराने वाला मैं,
तू केवल आदेश मान ले, डिग न झूठी दुविधाओं से,
तेरा बाण मात्र साधन है, शीश झुकाने वाला मैं।"
अठारह दिन का युद्ध थमा था, विजय-शंख घनघोर बजा,
पार्थ खड़े थे गर्वित मन से, शीश विजय का ताज सजा।
कृष्ण कहे, "उतर पहले तू", पार्थ तुरंत उतर आए,
छोड़ रश्मियाँ केशव जैसे, धरती पर पग धर पाए।
क्षण-भर में वह दिव्य रथ जलकर, भस्म का ढेर हो बिखरा,
ज्वाला-मुख से निकल-निकलकर, सारा काष्ठ चूर्ण बिखरा।
काँप उठे अर्जुन विस्मय से, "यह कैसा कौतुक भगवन?"
बोले माधव, "दिव्यास्त्रों से, पहले ही भस्म था यह तन।
तू तो समझ रहा था अर्जुन, अपनी विजय-गाथाओं से,
रथ को थाम रखा था मैंने, अपनी ही भुजाओं से,
तू बस जीत का श्रेय ले गया, अंत दिखाने वाला मैं,
तेरा बाण मात्र साधन है, भार उठाने वाला मैं।"
द्वारका डूबी, कान्हा छूटे, सूना जग का सार हुआ,
प्रभास-तट पर माधव बिन सब, तिनके-सा लाचार हुआ।
राह रोक ली भीलों ने जब, खींची अर्जुन ने डोरी,
किंतु हाथ से तीर न छूटा, शक्ति हो गई थी चोरी।
मंत्र लुप्त, गांडीव था भारी, भुजा-बल शून्य पड़ गया,
जिस पराक्रम पर गर्व था जग को, वह माटी में गड़ गया।
गूँज उठी तब शून्य गगन में, केशव की वह वाणी मौन,
"शक्ति धनुष में कभी न थी पार्थ, था भीतर तेरे कौन?
तू धनुष उठाए बैठा था, प्राण फूँकने वाला मैं,
तेरी शिरा-शिरा में केवल, शक्ति झोंकने वाला मैं,
सब कुछ खोकर आज समझ तू, मुक्त हो सब अभिमानों से,
तेरा बाण मात्र साधन था, साध्य बनाने वाला मैं।"
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