दौलत की दीवारों में जब, हमने घर को बाँध लिया,
झूठे रिश्तों की दुनिया को, सचमुच अपना मान लिया।
जीत गए हम सारी दुनिया, पर खुद को ही मार दिया...
माँ का आँचल छूट गया तो, सब कुछ हमने हार दिया!
दुपहरी,
दुपहरी जेठ की जलती, हवा में वो पतंगें थीं,
हमारे छोटे सीनों में, हज़ारों ही उमंगें थीं।
गला जब सूख जाता था, पसीने छूट जाते थे,
मगर हम घर की चौखट को, कभी ना देख पाते थे।
तभी चौखट से आँगन में, पुकार इक गूँज जाती थी,
मेरी ममतामयी माँ, पास अपने यों बुलाती थी—
कि "ओ मेरे लाल! आ कर पानी तो पी ले,
कि "ओ मेरे लाल! आ कर पानी तो पी ले,
झुलसती धूप है बाहर, ज़रा सी छाँव में जी ले!"
मगर सूखे लबों पे जीभ, हम बस फेर लेते थे,
तड़पती प्यास को हम, खेल में ही मार देते थे।
हमें मालूम था, घर गए तो खेल आधा छूट जाएगा,
हमें मालूम था, घर गए तो खेल आधा छूट जाएगा,
अगर भीतर कदम रखा तो, हुक्म ये आ ही जाएगा—
कि पानी पीने जो गया तो... मुझे फिर रोक लेगी!
मुझे पक्का पता था... माँ मुझे फिर रोक लेगी!
लुका-छिपी के खेलों में, गली-कूचे सुहाते थे,
मगर छुपने को अपने घर, कभी हम जा न पाते थे।
अगर घर में छुपे तो खौफ, बस हमको सताता था,
कि वापस लौट कर आना, बड़ा मुश्किल हो जाता था—
कि छुपने घर गया जो मैं... तो पक्का मुझको टोक देगी!
कि छुपने घर गया जो मैं... तो पक्का मुझको टोक देगी!
मुझे पक्का पता था... माँ मुझे फिर रोक लेगी!
उछल कर गेंद जो कभी, हमारे घर में जाती थी,
उसे वापस ले आने में, बड़ी घबराहट आती थी।
दबे पाँवों से जाते थे, कि आहट माँ न पा जाए,
दबे पाँवों से जाते थे, कि आहट माँ न पा जाए,
नज़र पड़ते ही उसकी, खेल सारा छूट ना जाए—
कि गेंद लेने गया तो... वो मेरा रस्ता रोक लेगी!
मुझे पक्का पता था... माँ मुझे फिर रोक लेगी!
ज़माना बीतने पर आज, मुझको याद आता है,
वो उसका डांटना भी, प्यार का इक गीत गाता है।
मुझे महफूज़ रखने को,
मुझे महफूज़ रखने को, वो खुद से बांधती थी माँ,
मेरी खातिर दुवाएं, उम्र भर ही मांगती थी माँ।
मगर अब वक़्त की आंधी, मुझे किस मोड़ ले आई,
मिली शोहरत मुझे लेकिन, मिली गहरी है तन्हाई।
नहीं कोई भी अब पीछे से, मुझको यों बुलाता है,
थके-हारे से माथे को, न आँचल में सुलाता है।
मैं जलता हूँ मगर मुझको, बचाने कौन आता है?
मेरी सूखी हुई इस प्यास को, अब कौन बुझाता है?
कहाँ वो खेल का मैदान, चौखट पीछे छूट गई,
कहाँ वो रूठना मेरा, कहाँ वो ममता रूठ गई?
कहाँ वो रूठना मेरा, कहाँ वो ममता रूठ गई?
यही सोचूँ कि वापस जाऊँ तो... वो फिर से टोक लेगी!
शायद पानी पीने जो गया तो... माँ मुझे फिर रोक लेगी!
खड़ा हूँ आज चौखट पे, मैं आँखों में नमी भर के,
बहुत थक सा गया हूँ मैं, ज़माने का सफ़र करके।
तरसता हूँ कि फिर से, गूँज वो कानों में आ जाए,
"मेरे बेटे तू पानी तो पी ले",
"कि पानी पीने जो गया तो... मुझे फिर रोक लेगी
"मेरे बेटे तू पानी तो पी ले", ये आवाज़ छा जाए।
कसम है माँ मुझे तेरी, बहाना अब न करूँगा,
तेरी चौखट पे गिरकर मैं, तेरा आँचल पकड़ लूँगा।
गिलास दोनों ही हाथों से, पकड़ कर पानी पी लूंगा,
मैं तेरा दर्द सारा, अपने ही माथे पे जी लूंगा।
मैं घर से बाहर जाने की, ज़िद अब ना करूँगा माँ!
मैं तेरे पास ही रह कर, हमेशा अब जिऊँगा माँ!
ऐ काश! चौखट से आज, आवाज़ फिर वो गूंज जाए...
काश! इस बार पानी पीने जाऊँ... और वो टोक ले...
काश! इस बार मेरी माँ... बचपन को हमेशा को रोक ले!
हाँ माँ! काश इस बार तू... मुझे हमेशा के लिए रोक ले!
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