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मेरे, अल्फाज़, ग़ज़ल ,आदमी ही आदमी

                
                                                         
                            आदमी ही, आदमी है,देखकर, घबरा गये
                                                                 
                            
छोड़कर हम गांव अपना, क्यों शहर में,आ, गये

असलियत को, छोड़कर हम,लग गये क्यों नक्ल में
गैर के मेहमान कैसे,अपने घर में आ,गये

कुछ पुराने राश्तों पर, न हुआ हासिल हमें,
इक नई उम्मीद लेकर, फिर सफर में आ गये

हमनें जाने से मना ,करके किया अच्छा ही था,
फिर भी इल्ज़ामात सारे, अपने सर पे आ गये

हां किसी ने भी सुनी न, अपनी निर्मला कामना,
घूम फिरकर हम जमाना, सबके दर पे आ गये

वक्त मिलता ही नहीं ,कि हम कभी खुद से मिले
आज हमको देख, जी भर, आइने चकरा गये
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11 महीने पहले

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