जो हस्ती मिटाने चलें थे हमारी,
वो खुद ही अब मिटते जा रहें हैं।
जो चलें थे सर हमारा झुकाने,
वो खुद ही नजरें झुकाए जा रहें हैं।।
वो जान बैठे थे चुप्पी को कमजोरी हमारी,
वो अब नजरों से मेरी छिपते जा रहें हैं।
कहते हैं पैर होते नहीं है झूठ के,
फिर भी वो तो बस चले जा रहे हैं।।
आया है समय अब हमारा तुम्हारा,
न जाने वो अब कहां छिपते जा रहें हैं।
जो हस्ती मिटाने चलें थे हमारी,
वो खुद ही अब मिटते जा रहें हैं।।
चलो अब उनकी नजरों में झांका जाएं,
हम कहां हैं उनसे अब पूछा जाए।
जो करते थे हरदम बातें हमारी,
वो अब क्यों नजरें झुकाए जा रहा है।।
जिनको हो रही थी हमारे स्वास्थ्य की चिंता,
वो खुद ही बीमार हुए जा रहे हैं।
जो दिला रहे थे हमको जिनसे गाली,
वो उनको क्यों गाली दिए जा रहे हैं।।
जो चलें थे मिटाने हस्ती हमारी,
वो खुद ही क्यों अब मिटते जा रहें हैं।
दुश्मन ही होता है सच्चा दोस्त अपना,
वो सही समय पर हमें आईना दिखाएं जा रहें हैं।।
जितने भी कांटे बिछाएं राहों में तुमने,
हम कांटों में फूल खिलाए जा रहें हैं।
न जाने कितने नाम रख दिए तुमने हमारे तुम्हारे,
हम सबको ही साथ लिए जा रहे हैं।।
डरा रहे हों हमको,या डर रहे हों खुद ही,
आने पर हमारे तुम क्यों चलें जा रहें हों।
जब भी आती है आईना दिखाने की बारी हमारी,
तुम नजरें झुकाए क्यों चलें जा रहें हों।।
जो हस्ती मिटाने चलें थे हमारी,
वो खुद ही अब मिटते जा रहें हैं।
जो चलें थे सर हमारा झुकाने,
वो खुद ही नजरें झुकाए जा रहें हैं।।
-राहुल भारद्वाज
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