क्या है तुम्हारे दिल में, ये मैं शायद जानता हूँ
फिर भी तुम्हारे होठों से जानना चाहता हूँ
सिलसिला ये यूँ ही कब तलक चलता रहेगा
तुम कुछ भी न कहो और मैं सब बताता रहूँ
नज़रों की ज़ुबाँ भी तो इशारे बहुत करती है,
और हर खामोशी तुम्हारी कहानी नई कहती है
फिर भी एक हाँ की आस दिल में मचलती है,
क्यों मैं धड़कनों से ही सब कुछ समझता रहूँ
माना कि अपनेपन को अल्फ़ाज़ नहीं चाहिए
एहसास के दरिया को आवाज़ नहीं चाहिए
लेकिन कभी तो थोड़ा बहुत इज़हार हो तुमसे भी
कब तक मैं अकेला ही अपनी बात कहता रहूँ
मौन रखकर मिलने से तो न मिलना ही अच्छा है,
यूँ पास होकर भी अपना दूर रहना ही अच्छा है
अगर बिना बात किए ही गुज़रना है यूं हर बार,
तो फिर खयालों में ही सही तुमसे बाते करता रहूं
गर सच में मेरे खातिर कुछ हलचल है दिल में,
तो तोड़ दो ये दिवारे सारी मिटा जाओ फ़ासले
इक बार तो कहो कि ये अपनापन सिर्फ वहम नहीं
और उम्र भर उसी लम्हे को मैं फिर गुनगुनाता रहूँ
-नंदकुमार भागवत
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