दोस्त ने कहां मियां आजकल इश्क पर लिखते ही नहीं ?
हमने कहां अमरीका इजराइल बमबारी से रुकते ही नहीं !
जंग के माहौल में इतनी आसानी से शायरी कहां सुझती हैं
चारों ओर देखों तो बस बरबादी ही बरबादी तो दिखती हैं
चीखों की आवाज से दिल के जज्बात सारे सुन्न हो जाते हैं
इंसानी जज्बात और लफ्ज़ सारे अपना मायना खो जाते हैं
सुलीपर लटकाने के बाद भी येशु ने सबको माफकिया था
आज उसीके बंदोंने उसके हत्यारोंके साथ हाथ मिलाया था
मुमकिन हैं कि हालात इतने बिगड़ते भी नहीं थे शायद
गर ईरान के पिल्ले यहूदियों की हत्या न करते शायद
दोनों तरफ हो अपराधी,किसी का पक्ष लेना मुश्किल हो जाता हैं
लेकिन सदियों से जिस से रिश्ता हैं उस ईरान के लिए दिल भर आता हैं
-नंदकुमार भागवत।
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