नम्रता एक आदर्श मानवीय अंलकार है
जिस मानव में नम्रता नहीं है
उसमें मानवता नहीं है
मानवता से मानव का निर्माण हुआ है
यही तो विभक्त करता है मानव और दानव में
इस युग में बनावट में कोई अंतर नहीं मानव और दानव में
इसलिए गुण के आधार पर
अंतर करना पड़ता मानव और दानव में
कोई भी मानव संपूर्णरुप मानव नहीं होता है
कुछ गुण दानव के, मानव में मौजूद रहते हैं
या यह भी कह सकते हैं कि
दानव में मानव के गुण मौजूद हो सकते हैं
अब यह निष्कर्ष निकलता है कि
मनुष्य गुणों के अनुसार मानव अथवा दानव हो सकते हैं
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